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Baten Apni (My Thoughts)

My thoughts and poems on this society / country / world or all happenings around me or read in news papers or watch in TV news etc.



२०१० शंकर भोपाली स्टाइल ...

Sunday, January 3, 2010
बाल धोनी से बढ़ा ले, साल आया है नया
कटिंग के पैसे बचा ले, साल आया है नया

ऐड की शूटिंग करो, किरकेट जाए भाड़ में
रैंप पर खुद को चला ले, साल आया है नया

जो पुरानी चप्पलें हैं, मन्दिरों के पास रख
कुछ नये जूते उठा ले, साल आया है नया

आरती का थाल आए तो चवन्नी डालकर
नोट तू दस का उठा ले, साल आया है नया

चार मुक्तक तो हमारे सामने ही पढ़ गया
संकलन पूरा चुरा ले, साल आया है नया

चाहता है तू हसीनों से अगर नज़दीकियाँ
चाट का ठेला लगा ले, साल आया है नया

मैं अठन्नी दे रहा था, तब भिखारी ने कहा
तू यहां चादर बिछा ले, साल आया है नया

चार दिन तो बर्फ गिरने के बहाने चल गए
आज तो ‘हुल्लड़’ नहा ले, साल आया है नया

जो कि पिछले साल तुझको दे रहा था गालियाँ
चाय पर उसको बुला ले साल आया है नया

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अल्लाह की याद..

थोड़ी सी इबादत बहुत सा सिला देती है,
गुलाब की तरह चेहरा खिला देती है,
अल्लाह की याद को दिल से जाने न देना,
कभी कभी छोटी सी दुआ अर्श हिला देती है ..

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कभी ज़मी न छोड़ना ..

सामने हो मंजिल तो रास्ता न छोड़ना,
जो मन में हो वो ख्वाब न तोड़ना,
हर कदम पे मिलेगी कामयाबी तुम्हे,
बस सितारों को छूने के लिए,
कभी ज़मी न छोड़ना..

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लाड़ली बिटिया

Friday, November 20, 2009
एक गुडिया के कच्चे रुई के फाहे सी है बिटिया
कभी उछ्लकर कभी बिदककर आटे की चिडिया है बिटिया
नन्हे पावों की धीमी थाप है बिटिया
सर्दी में गर्म रोटी की भाप है बिटिया
बिटिया संगम का गंगाजल है
बिटिया गरीब किसान का हल है
चूडियों की खनक , पायलों की झंकार है बिटिया
झरने की मद्दम फुहार है बिटिया
कभी धुप कभी छाव कभी बरसात है बिटिया
गर्मी में पहली बारिश की सौगात है बिटिया
चिडियों की चहचाहट कोयल की कूक है बिटिया
हो जिसमे सबका भला वो प्यारा सा झूठ है बिटिया
और किसी मुश्किल खेल में मिलने वाली जीत है बिटिया
दिल को छु जाए वो मधुर गीत है बिटिया
माँ की एक पुकार है बिटिया
मुस्काता एक त्यौहार है बिटिया
सच बोलूं तो बिटिया पीडा की गहरी घाटी है
क्या किसी ने उसकी पीडा रत्ती भर भी बांटी है
अरमानो के काले जंगल उसको रोज जागाते हैं
हम, बिटिया कैसी हो कह कर चुप चाप सो जाते हैं
हर दुःख को हंसते हंसते बिन बोले सह लेती है
पूरे घर में खुशी बिखेरे बिटिया दुःख में रह लेती है

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सोचो ज़रा सोचो, जन्नत कैसा हो?

Tuesday, November 25, 2008
ये सुंदर पथ का अंत ना हों तो, कैसा हो?
ये दुनिया सपनों का देश हों तो, कैसा हो?
सभी लोग अपने हों तो, कैसा हो?
सभी धर्म एक हों तो, कैसा हो?
सारा जहान अपना हों तो, कैसा हो?
सारे जग में भाईचारा हों तो, कैसा हो?
सोचो ज़रा सोचो, सब एक दुजे का हों तो, कैसा हो?
शायद जन्नत जैसा हो, शायद जन्नत जैसा हों.

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